
पखांजूर में आज वह बहुप्रतीक्षित 8 तारीख की बैठक संपन्न हुई, जिस पर पूरे क्षेत्र की नजरें टिकी थीं। एसडीएम कार्यालय में आयोजित इस बैठक में वन विभाग, पुलिस प्रशासन और आदिवासी समाज के प्रतिनिधि आमने-सामने बैठे। हालांकि, घंटों चली चर्चा के बावजूद आज भी मामला पूरी तरह नहीं सुलझ पाया है। आज की बैठक में नहीं हुआ अंतिम फैसला, एक और निर्णायक बैठक की तारीख तय। देवी-देवताओं की पूजा के लिए बनाई जाने वाली शराब पर पुलिसिया कार्रवाई से आदिवासी समाज में भारी नाराजगी। अगली बैठक में सभी पंचायतों के सचिवों को भी रहने के निर्देश। आज एसडीएम कार्यालय में आदिवासी प्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच तीखी बहस देखने को मिली। बैठक का मुख्य केंद्र बिंदु पुलिस द्वारा आदिवासियों को शराब के मामलों में जेल भेजना रहा। “हमारा समाज सदियों से देवी-देवताओं की पूजा और पारंपरिक अनुष्ठानों के लिए महुआ शराब बनाता आ रहा है। यह हमारी संस्कृति का हिस्सा है, व्यापार नहीं। लेकिन शासन और पुलिस प्रशासन हमें शराब तस्कर मानकर जेल भेज रहा है। बिना उचित जानकारी के भोले-भाले आदिवासियों पर की जा रही यह कार्रवाई बंद होनी चाहिए। एसडीएम और पुलिस विभाग के आला अधिकारियों ने समाज की बातों को सुना, लेकिन किसी अंतिम निर्णय (Final Decision) पर नहीं पहुँचा जा सका। मामले की गंभीरता और जमीनी हकीकत को समझने के लिए प्रशासन ने अब एक और विस्तृत बैठक बुलाने का निर्णय लिया है। प्रशासन का मानना है कि जमीनी स्तर पर सूचनाओं की कमी है, इसलिए अगली बैठक में क्षेत्र के सभी पंचायत सचिवों को अनिवार्य रूप से बुलाया गया है। प्रशासन और समाज के बीच तालमेल बिठाने के लिए सचिवों के माध्यम से एक रिपोर्ट तैयार की जाएगी। आदिवासी समाज ने साफ कर दिया है कि अगर अगली बैठक में उनकी संस्कृति के सम्मान और पुलिसिया उत्पीड़न पर ठोस फैसला नहीं हुआ, तो वे सीधे न्यायालय (कोर्ट) का रुख करेंगे। पखांजूर का यह मामला अब सिर्फ वन विभाग या पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह आदिवासी अस्मिता और परंपरा से जुड़ गया है। क्या प्रशासन अगली बैठक में कोई बीच का रास्ता निकाल पाएगा? या फिर आदिवासियों का यह आक्रोश कानूनी लड़ाई का रूप लेगा?
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